Sunday, November 11, 2012


सरदार पटेल की विलक्षण उपलब्धि

Posted: Sun, 11 Nov 2012 02:42:36 +0000
indian-summer-bookहाल ही में एक अत्यंत रोचक पुस्तक: इण्डियन समरदि सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ दि एण्ड ऑफ एन एम्पायरदेखने को मिली। इसकी लेखिका एक जर्मन महिला हैं। जिनका नाम है आलेक्स फॉन टूनसेलमान। यह उनकी पहली पुस्तक है।

पुरस्कार विजेता इतिहासकार विलियम डलरिम्पल ने इस पुस्तक को एक श्रेष्ठ कृति‘ और स्वतंत्रता तथा भारत व पाकिस्तान विभाजन पर मेरे द्वारा पढ़ी गई निस्संदेह उत्तम पुस्तक” के रुप में वर्णित किया है।

जब भारत पर अंग्रेजी राज था तब देश एक राजनीतिक इकाई नहीं था। इसके दो मुख्य घटक थे: पहलाब्रिटिश भारतदूसरा,रियासतों वाला भारत। रियासतों वाले भारत में 564 रियासतें थी।

वी.पी. मेनन की पुस्तक: दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स में प्रसिध्द पत्रकार एम.वी. कामथ ने लेखक के बारे में यह टिप्पणी की है:

bookजबकि सभी रियासतों-जैसाकि उन्हें पुकारा जाता था-को भारत संघ में विलय कराने का श्रेय सरदार को जाता हैलेकिन वह भी ऐसा इसलिए कर पाए कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का उदार समर्थन मिला जो राजाओं की मानसिकता और मनोविज्ञान से भलीभांति परिचित थेऔर यह व्यक्ति कौन थायह थे वापल पनगुन्नी मेनन-वी.पी. मेनन के नाम से उन्हें जल्दी ही पहचाना जाने लगा।

वीपी के प्रारम्भिक जीवन के बारे में कम जानकारी उपलब्ध है। एक ऐसा व्यक्ति जो सभी व्यवहारिक रुप से पहले,अंतिम वायसराय लार्ड लुईस माउंटबेटन और बाद में,, भारत के लौह पुरुष महान सरदार वल्लभ भाई पटेल के खासमखास बनेने स्वयं गुमनामी में जाने से पहले अपने बारे में बहुत कम जानकारी छोड़ी। यदि वह सत्ता के माध्यम से कुछ भी पाना चाहते तो जो मांगते मिल जाता।

यह पुस्तक वी.पी. मेनन द्वारा भारतीय इतिहास के इस चरण पर लिखे गए दो विशाल खण्डों में से पहली (1955) है। दूसरी पुस्तक (1957) का शीर्षक है: दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डियाA

जिस पुस्तक ने मुझे आज का ब्लॉग लिखने हेतु बाध्य कियाउसमें रियासती राज्यों के मुद्दे पर ए फुल बास्केट ऑफ ऐप्पल्सशीर्षक वाला अध्याय है। इस अध्याय की शुरुआत इस प्रकार है:

”18 जुलाई को राजा ने लंदन में इण्डिया इंटिपेंडेंस एक्ट पर हस्ताक्षर किए और माउंटबेटन दम्पति ने अपने विवाह की रजत जयंती दिल्ली में मनाईपच्चीस वर्ष बाद उसी शहर में जहां दोनों की सगाई हुई थी।

louisयह पुस्तक कहती है कि रियासती राज्यों के बारे में ब्रिटिश सरकार के इरादे अटली द्वारा जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दिए गए थे।” माउंटबेटन से यह अपेक्षा थी कि वह रियासतों की ब्रिटिश भारत से उनके भविष्य के रिश्ते रखने में सही दृष्टिकोण अपनाने हेतु सहायता करेंगे। नए वायसराय को भी यह बता दिया गया था कि जिन राज्यों में राजनीतिक प्रक्रिया धीमी थीके शासकों को वे अधिक लोकतांत्रिक सरकार के किसी भी रुप हेतु तैयार करें।

माउन्टबेंटन ने इसका अर्थ यह लगाया कि वह प्रत्येक राजवाड़े पर दबाव बना सकें कि वह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने हेतु अपनी जनता के बहुमत के अनुरुप निर्णय करें। उन्होंने पटेल को सहायता करना स्वीकार किया और 15 अगस्त से पहले ए फुल बास्केट ऑफ ऐपल्स‘ देने का वायदा किया।

sardar-patelजुलाई को स्टेट्स के प्रतिनिधि अपनी प्रारम्भिक स्थिति के बारे में मिले। टुनसेलमान के मुताबिक अधिकांश राज्य भारत के साथ मिलना चाहते थे। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से चार-हैदराबादकश्मीरभोपाल और त्रावनकोर-स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहते थे। इनमें से प्रत्येक राज्य की अपनी अनोखी समस्याएं थीं। हैदराबाद का निजाम दुनिया में सर्वाधिक अमीर आदमी था: वह मुस्लिम थाऔर उसकी प्रजा अधिकांश हिन्दू। उसकी रियासत बड़ी थी और ऐसी अफवाहें थीं कि फ्रांस व अमेरिका दोनों ही उसको मान्यता देने को तैयार थे। कश्मीर के महाराजा हिन्दू थे और उनकी प्रजा अधिकांशतया मुस्लिम थी। उनकी रियासत हैदराबाद से भी बड़ी थी परन्तु व्यापार मार्गों और औद्योगिक संभावनाओं के अभाव के चलते काफी सीमित थी। भोपाल के नवाब एक योग्य और महत्वाकांक्षी रजवाड़े थे और जिन्ना के सलाहकारों में से एक थे: उनके दुर्भाग्य से उनकी रियासत हिन्दूबहुल थी और वह भारत के एकदम बीचोंबीच थीपाकिस्तान के साथ संभावित सीमा से 500 मील से ज्यादा दूर। हाल ही में त्रावनकोर में यूरेनियम भण्डार पाए गएजिससे स्थिति ने अत्यधिक अंतर्राष्ट्रीय दिलचस्पी बड़ा दी।

इस समूचे प्रकरण में मुस्लिम लीग की रणनीति इस पर केंद्रित थी कि अधिक से अधिक रजवाड़े भारत में मिलने से इंकार कर दें। जिन्ना यह देखने के काफी इच्छुक थे कि नेहरु और पटेल को घुन लगा हुआ भारत मिले जो उनके घुन लगे पाकिस्तान” के साथ चल सके। लेकिन सरदार पटेललार्ड माउंटबेंटन और वी.पी. मेनन ने एक ताल में काम करते हुए ऐसे सभी षडयंत्रों को विफल किया।

इस महत्वपूर्ण अध्याय की अंतिम पंक्तियां इस जोड़ी की उपलब्धि के प्रति एक महान आदरांजलि है। ऑलेक्स फॉन टुनेसलेमान लिखती हैं:

alex-vonमाउंटबेटन की तरकीबों या पटेल के तरीकों के बारे में चाहे जो कहा जाएउनकी उपलब्धि उल्लेखनीय रहेगी। और एक वर्ष के भीतर हीइन दोनों के बारे में तर्क दिया जा सकता है कि इन दोनों ने 90 वर्ष के ब्रिटिश राज,मुगलशासन के 180 वर्षों या अशोक अथवा मौर्या शासकों के 130 वर्षों की तुलना में एक विशाल भारतज्यादा संगठित भारत हासिल किया।

जो जर्मन महिला ने जो अर्थपूर्ण ढंग से लिखा है उसकी पुष्टि वी.पी. मेनन द्वारा दि स्टोरी ऑफ इंटीगिरेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स‘ के 612 पृष्ठों में तथ्यों और आंकड़ों से इस प्रकार की है।

vp-menon”564 भारतीय राज्य पांचवा हिस्सा या लगभग आधा देश बनाते हैं: कुछ बड़े स्टेट्स थेकुछ केवल जागीरें। जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक पृथक देश बना तब भारत का 364, 737 वर्ग मील और 81.5मिलियन जनसंख्या से हाथ धोना पड़ा लेकिन स्टेट्स का भारत में एकीकरण होने से भारत को लगभग 500,000 वर्ग मील और 86.5 मिलियन जनसंख्या जुड़ी जिससेभारत की पर्याप्त क्षतिपूर्ति हुई।

स्टेट्स के एकीकरण सम्बंधी अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में वी.पी. मेनन लिखते हैं: यह पुस्तक स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल को किए गए वायदे की आंशिक पूर्ति है। यह उनकी तीव्र इच्छा थी कि मैं दो पुस्तकें लिखूंजिसमें से एक में उन घटनाओं का वर्णन हो जिनके चलते सत्ता का हस्तांतरण हुआ और दूसरी भारतीय स्टेट्स के एकीकरण से सम्बन्धित हो।

टेलपीस (पश्च्यलेख)
30 अक्टूबर, 2012 को सरदार पटेल की जयंती की पूर्व संध्या पर पायनियर‘ ने एक समाचार प्रकाशित किया कि कैसे प्रधानमंत्री नेहरु हैदराबाद की मुक्ति के सरदार की योजना को असफल करना चाहते थे।

समाचार इस प्रकार है:

तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल जिनकी 137वीं जयंती 31 अक्टूबर को हैको तब के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु द्वारा एक केबिनेट मीटिंग के दौरान अपमानित और लांछित किया गया। आप एक पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझावों और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता”-नेहरु एक महत्वपूर्ण केबिनेट बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाए जिसमें निजाम की निजी सेना-रजाकारों के चंगुल सेसेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार हो रहा था।

हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर से अपने पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुऐ कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। 1947 बैच के आईएस अधिकारी एम के नायर ने अपने संस्मरण विद नो इल फीलिंग टू एनीबॉडी” में लिखा है कि उन्होंने तब से नेहरु से बोलना भी बंद कर दिया।

हालांकि नायर ने उपरोक्त वर्णित कैबिनेट बैठक की सही तिथि नहीं लिखी हैपरन्तु यह हैदराबाद मुक्ति के लिए चलाए गए भारतीय सेना के अभियान ऑपरेशन पोलोजो 13 सितम्बर, 1948 को शुरु होकर 18 सितम्बर को समाप्त हुआके पूर्ववर्ती सप्ताहों में हुई होगी।

जबकि सरदार पटेल 2,00,000 रजाकारों के बलात्कार और उत्पात से हैदराबाद को मुक्त कराने के लिए सेना की सीधी कार्रवाई चाहते थेउधर नेहरु संयुक्त राष्ट्र के विकल्प को प्राथमिकता दे रहे थे।

नायर लिखते हैं कि सरदार पटेल के प्रति नेहरु की निजी घृणा 15 सितम्बर, 1950 को उस दिन और खुलकर सामने आई जिस दिन सरदार ने बॉम्बे (अब मुंबई) में अंतिम सांस ली। सरदार पटेल की मृत्यु का समाचार पाने के तुरंत बाद नेहरु ने राज्यों के मंत्रालय को दो नोट भेजेइनमें से एक में नेहरु ने मेनन को लिखा कि सरदार पटेल द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली के कडिल्लक(Cadillacकार को उनके कार्यालय को वापस भेज दिया जाए। दूसरा नोट क्षुब्ध कर देने वाला था। नेहरु चाहते थे कि सरकार के जो सचिव सरदार पटेल की अंतिम क्रिया में भाग लेने के इच्छुक थेवे अपने निजी खर्चे पर ही जाएं।

लेकिन मेनन ने सभी सचिवों की बैठक बुलाई और जो अंतिम क्रिया में जाना चाहते थेकी सूची मांगी। नेहरु द्वारा भेजे गए नोट‘ का उन्होंने कोई उल्लेख नहीं किया। जिन लोगों ने सरदार की अंतिम यात्रा में जाने की इच्छा व्यक्त की थी उनके हवाई यात्रा के टिकट का पूरा खर्चा मेनन ने चुकाया।


सरदार पटेल की विलक्षण उपलब्धि

Posted: Sun, 11 Nov 2012 02:42:36 +0000
indian-summer-bookहाल ही में एक अत्यंत रोचक पुस्तक: इण्डियन समरदि सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ दि एण्ड ऑफ एन एम्पायरदेखने को मिली। इसकी लेखिका एक जर्मन महिला हैं। जिनका नाम है आलेक्स फॉन टूनसेलमान। यह उनकी पहली पुस्तक है।

पुरस्कार विजेता इतिहासकार विलियम डलरिम्पल ने इस पुस्तक को एक श्रेष्ठ कृति‘ और स्वतंत्रता तथा भारत व पाकिस्तान विभाजन पर मेरे द्वारा पढ़ी गई निस्संदेह उत्तम पुस्तक” के रुप में वर्णित किया है।

जब भारत पर अंग्रेजी राज था तब देश एक राजनीतिक इकाई नहीं था। इसके दो मुख्य घटक थे: पहलाब्रिटिश भारतदूसरा,रियासतों वाला भारत। रियासतों वाले भारत में 564 रियासतें थी।

वी.पी. मेनन की पुस्तक: दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स में प्रसिध्द पत्रकार एम.वी. कामथ ने लेखक के बारे में यह टिप्पणी की है:

bookजबकि सभी रियासतों-जैसाकि उन्हें पुकारा जाता था-को भारत संघ में विलय कराने का श्रेय सरदार को जाता हैलेकिन वह भी ऐसा इसलिए कर पाए कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का उदार समर्थन मिला जो राजाओं की मानसिकता और मनोविज्ञान से भलीभांति परिचित थेऔर यह व्यक्ति कौन थायह थे वापल पनगुन्नी मेनन-वी.पी. मेनन के नाम से उन्हें जल्दी ही पहचाना जाने लगा।

वीपी के प्रारम्भिक जीवन के बारे में कम जानकारी उपलब्ध है। एक ऐसा व्यक्ति जो सभी व्यवहारिक रुप से पहले,अंतिम वायसराय लार्ड लुईस माउंटबेटन और बाद में,, भारत के लौह पुरुष महान सरदार वल्लभ भाई पटेल के खासमखास बनेने स्वयं गुमनामी में जाने से पहले अपने बारे में बहुत कम जानकारी छोड़ी। यदि वह सत्ता के माध्यम से कुछ भी पाना चाहते तो जो मांगते मिल जाता।

यह पुस्तक वी.पी. मेनन द्वारा भारतीय इतिहास के इस चरण पर लिखे गए दो विशाल खण्डों में से पहली (1955) है। दूसरी पुस्तक (1957) का शीर्षक है: दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डियाA

जिस पुस्तक ने मुझे आज का ब्लॉग लिखने हेतु बाध्य कियाउसमें रियासती राज्यों के मुद्दे पर ए फुल बास्केट ऑफ ऐप्पल्सशीर्षक वाला अध्याय है। इस अध्याय की शुरुआत इस प्रकार है:

”18 जुलाई को राजा ने लंदन में इण्डिया इंटिपेंडेंस एक्ट पर हस्ताक्षर किए और माउंटबेटन दम्पति ने अपने विवाह की रजत जयंती दिल्ली में मनाईपच्चीस वर्ष बाद उसी शहर में जहां दोनों की सगाई हुई थी।

louisयह पुस्तक कहती है कि रियासती राज्यों के बारे में ब्रिटिश सरकार के इरादे अटली द्वारा जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दिए गए थे।” माउंटबेटन से यह अपेक्षा थी कि वह रियासतों की ब्रिटिश भारत से उनके भविष्य के रिश्ते रखने में सही दृष्टिकोण अपनाने हेतु सहायता करेंगे। नए वायसराय को भी यह बता दिया गया था कि जिन राज्यों में राजनीतिक प्रक्रिया धीमी थीके शासकों को वे अधिक लोकतांत्रिक सरकार के किसी भी रुप हेतु तैयार करें।

माउन्टबेंटन ने इसका अर्थ यह लगाया कि वह प्रत्येक राजवाड़े पर दबाव बना सकें कि वह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने हेतु अपनी जनता के बहुमत के अनुरुप निर्णय करें। उन्होंने पटेल को सहायता करना स्वीकार किया और 15 अगस्त से पहले ए फुल बास्केट ऑफ ऐपल्स‘ देने का वायदा किया।

sardar-patelजुलाई को स्टेट्स के प्रतिनिधि अपनी प्रारम्भिक स्थिति के बारे में मिले। टुनसेलमान के मुताबिक अधिकांश राज्य भारत के साथ मिलना चाहते थे। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से चार-हैदराबादकश्मीरभोपाल और त्रावनकोर-स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहते थे। इनमें से प्रत्येक राज्य की अपनी अनोखी समस्याएं थीं। हैदराबाद का निजाम दुनिया में सर्वाधिक अमीर आदमी था: वह मुस्लिम थाऔर उसकी प्रजा अधिकांश हिन्दू। उसकी रियासत बड़ी थी और ऐसी अफवाहें थीं कि फ्रांस व अमेरिका दोनों ही उसको मान्यता देने को तैयार थे। कश्मीर के महाराजा हिन्दू थे और उनकी प्रजा अधिकांशतया मुस्लिम थी। उनकी रियासत हैदराबाद से भी बड़ी थी परन्तु व्यापार मार्गों और औद्योगिक संभावनाओं के अभाव के चलते काफी सीमित थी। भोपाल के नवाब एक योग्य और महत्वाकांक्षी रजवाड़े थे और जिन्ना के सलाहकारों में से एक थे: उनके दुर्भाग्य से उनकी रियासत हिन्दूबहुल थी और वह भारत के एकदम बीचोंबीच थीपाकिस्तान के साथ संभावित सीमा से 500 मील से ज्यादा दूर। हाल ही में त्रावनकोर में यूरेनियम भण्डार पाए गएजिससे स्थिति ने अत्यधिक अंतर्राष्ट्रीय दिलचस्पी बड़ा दी।

इस समूचे प्रकरण में मुस्लिम लीग की रणनीति इस पर केंद्रित थी कि अधिक से अधिक रजवाड़े भारत में मिलने से इंकार कर दें। जिन्ना यह देखने के काफी इच्छुक थे कि नेहरु और पटेल को घुन लगा हुआ भारत मिले जो उनके घुन लगे पाकिस्तान” के साथ चल सके। लेकिन सरदार पटेललार्ड माउंटबेंटन और वी.पी. मेनन ने एक ताल में काम करते हुए ऐसे सभी षडयंत्रों को विफल किया।

इस महत्वपूर्ण अध्याय की अंतिम पंक्तियां इस जोड़ी की उपलब्धि के प्रति एक महान आदरांजलि है। ऑलेक्स फॉन टुनेसलेमान लिखती हैं:

alex-vonमाउंटबेटन की तरकीबों या पटेल के तरीकों के बारे में चाहे जो कहा जाएउनकी उपलब्धि उल्लेखनीय रहेगी। और एक वर्ष के भीतर हीइन दोनों के बारे में तर्क दिया जा सकता है कि इन दोनों ने 90 वर्ष के ब्रिटिश राज,मुगलशासन के 180 वर्षों या अशोक अथवा मौर्या शासकों के 130 वर्षों की तुलना में एक विशाल भारतज्यादा संगठित भारत हासिल किया।

जो जर्मन महिला ने जो अर्थपूर्ण ढंग से लिखा है उसकी पुष्टि वी.पी. मेनन द्वारा दि स्टोरी ऑफ इंटीगिरेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स‘ के 612 पृष्ठों में तथ्यों और आंकड़ों से इस प्रकार की है।

vp-menon”564 भारतीय राज्य पांचवा हिस्सा या लगभग आधा देश बनाते हैं: कुछ बड़े स्टेट्स थेकुछ केवल जागीरें। जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक पृथक देश बना तब भारत का 364, 737 वर्ग मील और 81.5मिलियन जनसंख्या से हाथ धोना पड़ा लेकिन स्टेट्स का भारत में एकीकरण होने से भारत को लगभग 500,000 वर्ग मील और 86.5 मिलियन जनसंख्या जुड़ी जिससेभारत की पर्याप्त क्षतिपूर्ति हुई।

स्टेट्स के एकीकरण सम्बंधी अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में वी.पी. मेनन लिखते हैं: यह पुस्तक स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल को किए गए वायदे की आंशिक पूर्ति है। यह उनकी तीव्र इच्छा थी कि मैं दो पुस्तकें लिखूंजिसमें से एक में उन घटनाओं का वर्णन हो जिनके चलते सत्ता का हस्तांतरण हुआ और दूसरी भारतीय स्टेट्स के एकीकरण से सम्बन्धित हो।

टेलपीस (पश्च्यलेख)
30 अक्टूबर, 2012 को सरदार पटेल की जयंती की पूर्व संध्या पर पायनियर‘ ने एक समाचार प्रकाशित किया कि कैसे प्रधानमंत्री नेहरु हैदराबाद की मुक्ति के सरदार की योजना को असफल करना चाहते थे।

समाचार इस प्रकार है:

तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल जिनकी 137वीं जयंती 31 अक्टूबर को हैको तब के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु द्वारा एक केबिनेट मीटिंग के दौरान अपमानित और लांछित किया गया। आप एक पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझावों और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता”-नेहरु एक महत्वपूर्ण केबिनेट बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाए जिसमें निजाम की निजी सेना-रजाकारों के चंगुल सेसेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार हो रहा था।

हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर से अपने पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुऐ कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। 1947 बैच के आईएस अधिकारी एम के नायर ने अपने संस्मरण विद नो इल फीलिंग टू एनीबॉडी” में लिखा है कि उन्होंने तब से नेहरु से बोलना भी बंद कर दिया।

हालांकि नायर ने उपरोक्त वर्णित कैबिनेट बैठक की सही तिथि नहीं लिखी हैपरन्तु यह हैदराबाद मुक्ति के लिए चलाए गए भारतीय सेना के अभियान ऑपरेशन पोलोजो 13 सितम्बर, 1948 को शुरु होकर 18 सितम्बर को समाप्त हुआके पूर्ववर्ती सप्ताहों में हुई होगी।

जबकि सरदार पटेल 2,00,000 रजाकारों के बलात्कार और उत्पात से हैदराबाद को मुक्त कराने के लिए सेना की सीधी कार्रवाई चाहते थेउधर नेहरु संयुक्त राष्ट्र के विकल्प को प्राथमिकता दे रहे थे।

नायर लिखते हैं कि सरदार पटेल के प्रति नेहरु की निजी घृणा 15 सितम्बर, 1950 को उस दिन और खुलकर सामने आई जिस दिन सरदार ने बॉम्बे (अब मुंबई) में अंतिम सांस ली। सरदार पटेल की मृत्यु का समाचार पाने के तुरंत बाद नेहरु ने राज्यों के मंत्रालय को दो नोट भेजेइनमें से एक में नेहरु ने मेनन को लिखा कि सरदार पटेल द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली के कडिल्लक(Cadillacकार को उनके कार्यालय को वापस भेज दिया जाए। दूसरा नोट क्षुब्ध कर देने वाला था। नेहरु चाहते थे कि सरकार के जो सचिव सरदार पटेल की अंतिम क्रिया में भाग लेने के इच्छुक थेवे अपने निजी खर्चे पर ही जाएं।

लेकिन मेनन ने सभी सचिवों की बैठक बुलाई और जो अंतिम क्रिया में जाना चाहते थेकी सूची मांगी। नेहरु द्वारा भेजे गए नोट‘ का उन्होंने कोई उल्लेख नहीं किया। जिन लोगों ने सरदार की अंतिम यात्रा में जाने की इच्छा व्यक्त की थी उनके हवाई यात्रा के टिकट का पूरा खर्चा मेनन ने चुकाया।


सरदार पटेल की विलक्षण उपलब्धि

Posted: Sun, 11 Nov 2012 02:42:36 +0000
indian-summer-bookहाल ही में एक अत्यंत रोचक पुस्तक: इण्डियन समरदि सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ दि एण्ड ऑफ एन एम्पायरदेखने को मिली। इसकी लेखिका एक जर्मन महिला हैं। जिनका नाम है आलेक्स फॉन टूनसेलमान। यह उनकी पहली पुस्तक है।

पुरस्कार विजेता इतिहासकार विलियम डलरिम्पल ने इस पुस्तक को एक श्रेष्ठ कृति‘ और स्वतंत्रता तथा भारत व पाकिस्तान विभाजन पर मेरे द्वारा पढ़ी गई निस्संदेह उत्तम पुस्तक” के रुप में वर्णित किया है।

जब भारत पर अंग्रेजी राज था तब देश एक राजनीतिक इकाई नहीं था। इसके दो मुख्य घटक थे: पहलाब्रिटिश भारतदूसरा,रियासतों वाला भारत। रियासतों वाले भारत में 564 रियासतें थी।

वी.पी. मेनन की पुस्तक: दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स में प्रसिध्द पत्रकार एम.वी. कामथ ने लेखक के बारे में यह टिप्पणी की है:

bookजबकि सभी रियासतों-जैसाकि उन्हें पुकारा जाता था-को भारत संघ में विलय कराने का श्रेय सरदार को जाता हैलेकिन वह भी ऐसा इसलिए कर पाए कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का उदार समर्थन मिला जो राजाओं की मानसिकता और मनोविज्ञान से भलीभांति परिचित थेऔर यह व्यक्ति कौन थायह थे वापल पनगुन्नी मेनन-वी.पी. मेनन के नाम से उन्हें जल्दी ही पहचाना जाने लगा।

वीपी के प्रारम्भिक जीवन के बारे में कम जानकारी उपलब्ध है। एक ऐसा व्यक्ति जो सभी व्यवहारिक रुप से पहले,अंतिम वायसराय लार्ड लुईस माउंटबेटन और बाद में,, भारत के लौह पुरुष महान सरदार वल्लभ भाई पटेल के खासमखास बनेने स्वयं गुमनामी में जाने से पहले अपने बारे में बहुत कम जानकारी छोड़ी। यदि वह सत्ता के माध्यम से कुछ भी पाना चाहते तो जो मांगते मिल जाता।

यह पुस्तक वी.पी. मेनन द्वारा भारतीय इतिहास के इस चरण पर लिखे गए दो विशाल खण्डों में से पहली (1955) है। दूसरी पुस्तक (1957) का शीर्षक है: दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डियाA

जिस पुस्तक ने मुझे आज का ब्लॉग लिखने हेतु बाध्य कियाउसमें रियासती राज्यों के मुद्दे पर ए फुल बास्केट ऑफ ऐप्पल्सशीर्षक वाला अध्याय है। इस अध्याय की शुरुआत इस प्रकार है:

”18 जुलाई को राजा ने लंदन में इण्डिया इंटिपेंडेंस एक्ट पर हस्ताक्षर किए और माउंटबेटन दम्पति ने अपने विवाह की रजत जयंती दिल्ली में मनाईपच्चीस वर्ष बाद उसी शहर में जहां दोनों की सगाई हुई थी।

louisयह पुस्तक कहती है कि रियासती राज्यों के बारे में ब्रिटिश सरकार के इरादे अटली द्वारा जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दिए गए थे।” माउंटबेटन से यह अपेक्षा थी कि वह रियासतों की ब्रिटिश भारत से उनके भविष्य के रिश्ते रखने में सही दृष्टिकोण अपनाने हेतु सहायता करेंगे। नए वायसराय को भी यह बता दिया गया था कि जिन राज्यों में राजनीतिक प्रक्रिया धीमी थीके शासकों को वे अधिक लोकतांत्रिक सरकार के किसी भी रुप हेतु तैयार करें।

माउन्टबेंटन ने इसका अर्थ यह लगाया कि वह प्रत्येक राजवाड़े पर दबाव बना सकें कि वह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने हेतु अपनी जनता के बहुमत के अनुरुप निर्णय करें। उन्होंने पटेल को सहायता करना स्वीकार किया और 15 अगस्त से पहले ए फुल बास्केट ऑफ ऐपल्स‘ देने का वायदा किया।

sardar-patelजुलाई को स्टेट्स के प्रतिनिधि अपनी प्रारम्भिक स्थिति के बारे में मिले। टुनसेलमान के मुताबिक अधिकांश राज्य भारत के साथ मिलना चाहते थे। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से चार-हैदराबादकश्मीरभोपाल और त्रावनकोर-स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहते थे। इनमें से प्रत्येक राज्य की अपनी अनोखी समस्याएं थीं। हैदराबाद का निजाम दुनिया में सर्वाधिक अमीर आदमी था: वह मुस्लिम थाऔर उसकी प्रजा अधिकांश हिन्दू। उसकी रियासत बड़ी थी और ऐसी अफवाहें थीं कि फ्रांस व अमेरिका दोनों ही उसको मान्यता देने को तैयार थे। कश्मीर के महाराजा हिन्दू थे और उनकी प्रजा अधिकांशतया मुस्लिम थी। उनकी रियासत हैदराबाद से भी बड़ी थी परन्तु व्यापार मार्गों और औद्योगिक संभावनाओं के अभाव के चलते काफी सीमित थी। भोपाल के नवाब एक योग्य और महत्वाकांक्षी रजवाड़े थे और जिन्ना के सलाहकारों में से एक थे: उनके दुर्भाग्य से उनकी रियासत हिन्दूबहुल थी और वह भारत के एकदम बीचोंबीच थीपाकिस्तान के साथ संभावित सीमा से 500 मील से ज्यादा दूर। हाल ही में त्रावनकोर में यूरेनियम भण्डार पाए गएजिससे स्थिति ने अत्यधिक अंतर्राष्ट्रीय दिलचस्पी बड़ा दी।

इस समूचे प्रकरण में मुस्लिम लीग की रणनीति इस पर केंद्रित थी कि अधिक से अधिक रजवाड़े भारत में मिलने से इंकार कर दें। जिन्ना यह देखने के काफी इच्छुक थे कि नेहरु और पटेल को घुन लगा हुआ भारत मिले जो उनके घुन लगे पाकिस्तान” के साथ चल सके। लेकिन सरदार पटेललार्ड माउंटबेंटन और वी.पी. मेनन ने एक ताल में काम करते हुए ऐसे सभी षडयंत्रों को विफल किया।

इस महत्वपूर्ण अध्याय की अंतिम पंक्तियां इस जोड़ी की उपलब्धि के प्रति एक महान आदरांजलि है। ऑलेक्स फॉन टुनेसलेमान लिखती हैं:

alex-vonमाउंटबेटन की तरकीबों या पटेल के तरीकों के बारे में चाहे जो कहा जाएउनकी उपलब्धि उल्लेखनीय रहेगी। और एक वर्ष के भीतर हीइन दोनों के बारे में तर्क दिया जा सकता है कि इन दोनों ने 90 वर्ष के ब्रिटिश राज,मुगलशासन के 180 वर्षों या अशोक अथवा मौर्या शासकों के 130 वर्षों की तुलना में एक विशाल भारतज्यादा संगठित भारत हासिल किया।

जो जर्मन महिला ने जो अर्थपूर्ण ढंग से लिखा है उसकी पुष्टि वी.पी. मेनन द्वारा दि स्टोरी ऑफ इंटीगिरेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स‘ के 612 पृष्ठों में तथ्यों और आंकड़ों से इस प्रकार की है।

vp-menon”564 भारतीय राज्य पांचवा हिस्सा या लगभग आधा देश बनाते हैं: कुछ बड़े स्टेट्स थेकुछ केवल जागीरें। जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक पृथक देश बना तब भारत का 364, 737 वर्ग मील और 81.5मिलियन जनसंख्या से हाथ धोना पड़ा लेकिन स्टेट्स का भारत में एकीकरण होने से भारत को लगभग 500,000 वर्ग मील और 86.5 मिलियन जनसंख्या जुड़ी जिससेभारत की पर्याप्त क्षतिपूर्ति हुई।

स्टेट्स के एकीकरण सम्बंधी अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में वी.पी. मेनन लिखते हैं: यह पुस्तक स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल को किए गए वायदे की आंशिक पूर्ति है। यह उनकी तीव्र इच्छा थी कि मैं दो पुस्तकें लिखूंजिसमें से एक में उन घटनाओं का वर्णन हो जिनके चलते सत्ता का हस्तांतरण हुआ और दूसरी भारतीय स्टेट्स के एकीकरण से सम्बन्धित हो।

टेलपीस (पश्च्यलेख)
30 अक्टूबर, 2012 को सरदार पटेल की जयंती की पूर्व संध्या पर पायनियर‘ ने एक समाचार प्रकाशित किया कि कैसे प्रधानमंत्री नेहरु हैदराबाद की मुक्ति के सरदार की योजना को असफल करना चाहते थे।

समाचार इस प्रकार है:

तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल जिनकी 137वीं जयंती 31 अक्टूबर को हैको तब के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु द्वारा एक केबिनेट मीटिंग के दौरान अपमानित और लांछित किया गया। आप एक पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझावों और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता”-नेहरु एक महत्वपूर्ण केबिनेट बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाए जिसमें निजाम की निजी सेना-रजाकारों के चंगुल सेसेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार हो रहा था।

हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर से अपने पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुऐ कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। 1947 बैच के आईएस अधिकारी एम के नायर ने अपने संस्मरण विद नो इल फीलिंग टू एनीबॉडी” में लिखा है कि उन्होंने तब से नेहरु से बोलना भी बंद कर दिया।

हालांकि नायर ने उपरोक्त वर्णित कैबिनेट बैठक की सही तिथि नहीं लिखी हैपरन्तु यह हैदराबाद मुक्ति के लिए चलाए गए भारतीय सेना के अभियान ऑपरेशन पोलोजो 13 सितम्बर, 1948 को शुरु होकर 18 सितम्बर को समाप्त हुआके पूर्ववर्ती सप्ताहों में हुई होगी।

जबकि सरदार पटेल 2,00,000 रजाकारों के बलात्कार और उत्पात से हैदराबाद को मुक्त कराने के लिए सेना की सीधी कार्रवाई चाहते थेउधर नेहरु संयुक्त राष्ट्र के विकल्प को प्राथमिकता दे रहे थे।

नायर लिखते हैं कि सरदार पटेल के प्रति नेहरु की निजी घृणा 15 सितम्बर, 1950 को उस दिन और खुलकर सामने आई जिस दिन सरदार ने बॉम्बे (अब मुंबई) में अंतिम सांस ली। सरदार पटेल की मृत्यु का समाचार पाने के तुरंत बाद नेहरु ने राज्यों के मंत्रालय को दो नोट भेजेइनमें से एक में नेहरु ने मेनन को लिखा कि सरदार पटेल द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली के कडिल्लक(Cadillacकार को उनके कार्यालय को वापस भेज दिया जाए। दूसरा नोट क्षुब्ध कर देने वाला था। नेहरु चाहते थे कि सरकार के जो सचिव सरदार पटेल की अंतिम क्रिया में भाग लेने के इच्छुक थेवे अपने निजी खर्चे पर ही जाएं।

लेकिन मेनन ने सभी सचिवों की बैठक बुलाई और जो अंतिम क्रिया में जाना चाहते थेकी सूची मांगी। नेहरु द्वारा भेजे गए नोट‘ का उन्होंने कोई उल्लेख नहीं किया। जिन लोगों ने सरदार की अंतिम यात्रा में जाने की इच्छा व्यक्त की थी उनके हवाई यात्रा के टिकट का पूरा खर्चा मेनन ने चुकाया।


सरदार पटेल की विलक्षण उपलब्धि

Posted: Sun, 11 Nov 2012 02:42:36 +0000
indian-summer-bookहाल ही में एक अत्यंत रोचक पुस्तक: इण्डियन समरदि सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ दि एण्ड ऑफ एन एम्पायरदेखने को मिली। इसकी लेखिका एक जर्मन महिला हैं। जिनका नाम है आलेक्स फॉन टूनसेलमान। यह उनकी पहली पुस्तक है।

पुरस्कार विजेता इतिहासकार विलियम डलरिम्पल ने इस पुस्तक को एक श्रेष्ठ कृति‘ और स्वतंत्रता तथा भारत व पाकिस्तान विभाजन पर मेरे द्वारा पढ़ी गई निस्संदेह उत्तम पुस्तक” के रुप में वर्णित किया है।

जब भारत पर अंग्रेजी राज था तब देश एक राजनीतिक इकाई नहीं था। इसके दो मुख्य घटक थे: पहलाब्रिटिश भारतदूसरा,रियासतों वाला भारत। रियासतों वाले भारत में 564 रियासतें थी।

वी.पी. मेनन की पुस्तक: दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स में प्रसिध्द पत्रकार एम.वी. कामथ ने लेखक के बारे में यह टिप्पणी की है:

bookजबकि सभी रियासतों-जैसाकि उन्हें पुकारा जाता था-को भारत संघ में विलय कराने का श्रेय सरदार को जाता हैलेकिन वह भी ऐसा इसलिए कर पाए कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का उदार समर्थन मिला जो राजाओं की मानसिकता और मनोविज्ञान से भलीभांति परिचित थेऔर यह व्यक्ति कौन थायह थे वापल पनगुन्नी मेनन-वी.पी. मेनन के नाम से उन्हें जल्दी ही पहचाना जाने लगा।

वीपी के प्रारम्भिक जीवन के बारे में कम जानकारी उपलब्ध है। एक ऐसा व्यक्ति जो सभी व्यवहारिक रुप से पहले,अंतिम वायसराय लार्ड लुईस माउंटबेटन और बाद में,, भारत के लौह पुरुष महान सरदार वल्लभ भाई पटेल के खासमखास बनेने स्वयं गुमनामी में जाने से पहले अपने बारे में बहुत कम जानकारी छोड़ी। यदि वह सत्ता के माध्यम से कुछ भी पाना चाहते तो जो मांगते मिल जाता।

यह पुस्तक वी.पी. मेनन द्वारा भारतीय इतिहास के इस चरण पर लिखे गए दो विशाल खण्डों में से पहली (1955) है। दूसरी पुस्तक (1957) का शीर्षक है: दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डियाA

जिस पुस्तक ने मुझे आज का ब्लॉग लिखने हेतु बाध्य कियाउसमें रियासती राज्यों के मुद्दे पर ए फुल बास्केट ऑफ ऐप्पल्सशीर्षक वाला अध्याय है। इस अध्याय की शुरुआत इस प्रकार है:

”18 जुलाई को राजा ने लंदन में इण्डिया इंटिपेंडेंस एक्ट पर हस्ताक्षर किए और माउंटबेटन दम्पति ने अपने विवाह की रजत जयंती दिल्ली में मनाईपच्चीस वर्ष बाद उसी शहर में जहां दोनों की सगाई हुई थी।

louisयह पुस्तक कहती है कि रियासती राज्यों के बारे में ब्रिटिश सरकार के इरादे अटली द्वारा जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दिए गए थे।” माउंटबेटन से यह अपेक्षा थी कि वह रियासतों की ब्रिटिश भारत से उनके भविष्य के रिश्ते रखने में सही दृष्टिकोण अपनाने हेतु सहायता करेंगे। नए वायसराय को भी यह बता दिया गया था कि जिन राज्यों में राजनीतिक प्रक्रिया धीमी थीके शासकों को वे अधिक लोकतांत्रिक सरकार के किसी भी रुप हेतु तैयार करें।

माउन्टबेंटन ने इसका अर्थ यह लगाया कि वह प्रत्येक राजवाड़े पर दबाव बना सकें कि वह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने हेतु अपनी जनता के बहुमत के अनुरुप निर्णय करें। उन्होंने पटेल को सहायता करना स्वीकार किया और 15 अगस्त से पहले ए फुल बास्केट ऑफ ऐपल्स‘ देने का वायदा किया।

sardar-patelजुलाई को स्टेट्स के प्रतिनिधि अपनी प्रारम्भिक स्थिति के बारे में मिले। टुनसेलमान के मुताबिक अधिकांश राज्य भारत के साथ मिलना चाहते थे। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से चार-हैदराबादकश्मीरभोपाल और त्रावनकोर-स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहते थे। इनमें से प्रत्येक राज्य की अपनी अनोखी समस्याएं थीं। हैदराबाद का निजाम दुनिया में सर्वाधिक अमीर आदमी था: वह मुस्लिम थाऔर उसकी प्रजा अधिकांश हिन्दू। उसकी रियासत बड़ी थी और ऐसी अफवाहें थीं कि फ्रांस व अमेरिका दोनों ही उसको मान्यता देने को तैयार थे। कश्मीर के महाराजा हिन्दू थे और उनकी प्रजा अधिकांशतया मुस्लिम थी। उनकी रियासत हैदराबाद से भी बड़ी थी परन्तु व्यापार मार्गों और औद्योगिक संभावनाओं के अभाव के चलते काफी सीमित थी। भोपाल के नवाब एक योग्य और महत्वाकांक्षी रजवाड़े थे और जिन्ना के सलाहकारों में से एक थे: उनके दुर्भाग्य से उनकी रियासत हिन्दूबहुल थी और वह भारत के एकदम बीचोंबीच थीपाकिस्तान के साथ संभावित सीमा से 500 मील से ज्यादा दूर। हाल ही में त्रावनकोर में यूरेनियम भण्डार पाए गएजिससे स्थिति ने अत्यधिक अंतर्राष्ट्रीय दिलचस्पी बड़ा दी।

इस समूचे प्रकरण में मुस्लिम लीग की रणनीति इस पर केंद्रित थी कि अधिक से अधिक रजवाड़े भारत में मिलने से इंकार कर दें। जिन्ना यह देखने के काफी इच्छुक थे कि नेहरु और पटेल को घुन लगा हुआ भारत मिले जो उनके घुन लगे पाकिस्तान” के साथ चल सके। लेकिन सरदार पटेललार्ड माउंटबेंटन और वी.पी. मेनन ने एक ताल में काम करते हुए ऐसे सभी षडयंत्रों को विफल किया।

इस महत्वपूर्ण अध्याय की अंतिम पंक्तियां इस जोड़ी की उपलब्धि के प्रति एक महान आदरांजलि है। ऑलेक्स फॉन टुनेसलेमान लिखती हैं:

alex-vonमाउंटबेटन की तरकीबों या पटेल के तरीकों के बारे में चाहे जो कहा जाएउनकी उपलब्धि उल्लेखनीय रहेगी। और एक वर्ष के भीतर हीइन दोनों के बारे में तर्क दिया जा सकता है कि इन दोनों ने 90 वर्ष के ब्रिटिश राज,मुगलशासन के 180 वर्षों या अशोक अथवा मौर्या शासकों के 130 वर्षों की तुलना में एक विशाल भारतज्यादा संगठित भारत हासिल किया।

जो जर्मन महिला ने जो अर्थपूर्ण ढंग से लिखा है उसकी पुष्टि वी.पी. मेनन द्वारा दि स्टोरी ऑफ इंटीगिरेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स‘ के 612 पृष्ठों में तथ्यों और आंकड़ों से इस प्रकार की है।

vp-menon”564 भारतीय राज्य पांचवा हिस्सा या लगभग आधा देश बनाते हैं: कुछ बड़े स्टेट्स थेकुछ केवल जागीरें। जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक पृथक देश बना तब भारत का 364, 737 वर्ग मील और 81.5मिलियन जनसंख्या से हाथ धोना पड़ा लेकिन स्टेट्स का भारत में एकीकरण होने से भारत को लगभग 500,000 वर्ग मील और 86.5 मिलियन जनसंख्या जुड़ी जिससेभारत की पर्याप्त क्षतिपूर्ति हुई।

स्टेट्स के एकीकरण सम्बंधी अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में वी.पी. मेनन लिखते हैं: यह पुस्तक स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल को किए गए वायदे की आंशिक पूर्ति है। यह उनकी तीव्र इच्छा थी कि मैं दो पुस्तकें लिखूंजिसमें से एक में उन घटनाओं का वर्णन हो जिनके चलते सत्ता का हस्तांतरण हुआ और दूसरी भारतीय स्टेट्स के एकीकरण से सम्बन्धित हो।

टेलपीस (पश्च्यलेख)
30 अक्टूबर, 2012 को सरदार पटेल की जयंती की पूर्व संध्या पर पायनियर‘ ने एक समाचार प्रकाशित किया कि कैसे प्रधानमंत्री नेहरु हैदराबाद की मुक्ति के सरदार की योजना को असफल करना चाहते थे।

समाचार इस प्रकार है:

तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल जिनकी 137वीं जयंती 31 अक्टूबर को हैको तब के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु द्वारा एक केबिनेट मीटिंग के दौरान अपमानित और लांछित किया गया। आप एक पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझावों और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता”-नेहरु एक महत्वपूर्ण केबिनेट बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाए जिसमें निजाम की निजी सेना-रजाकारों के चंगुल सेसेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार हो रहा था।

हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर से अपने पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुऐ कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। 1947 बैच के आईएस अधिकारी एम के नायर ने अपने संस्मरण विद नो इल फीलिंग टू एनीबॉडी” में लिखा है कि उन्होंने तब से नेहरु से बोलना भी बंद कर दिया।

हालांकि नायर ने उपरोक्त वर्णित कैबिनेट बैठक की सही तिथि नहीं लिखी हैपरन्तु यह हैदराबाद मुक्ति के लिए चलाए गए भारतीय सेना के अभियान ऑपरेशन पोलोजो 13 सितम्बर, 1948 को शुरु होकर 18 सितम्बर को समाप्त हुआके पूर्ववर्ती सप्ताहों में हुई होगी।

जबकि सरदार पटेल 2,00,000 रजाकारों के बलात्कार और उत्पात से हैदराबाद को मुक्त कराने के लिए सेना की सीधी कार्रवाई चाहते थेउधर नेहरु संयुक्त राष्ट्र के विकल्प को प्राथमिकता दे रहे थे।

नायर लिखते हैं कि सरदार पटेल के प्रति नेहरु की निजी घृणा 15 सितम्बर, 1950 को उस दिन और खुलकर सामने आई जिस दिन सरदार ने बॉम्बे (अब मुंबई) में अंतिम सांस ली। सरदार पटेल की मृत्यु का समाचार पाने के तुरंत बाद नेहरु ने राज्यों के मंत्रालय को दो नोट भेजेइनमें से एक में नेहरु ने मेनन को लिखा कि सरदार पटेल द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली के कडिल्लक(Cadillacकार को उनके कार्यालय को वापस भेज दिया जाए। दूसरा नोट क्षुब्ध कर देने वाला था। नेहरु चाहते थे कि सरकार के जो सचिव सरदार पटेल की अंतिम क्रिया में भाग लेने के इच्छुक थेवे अपने निजी खर्चे पर ही जाएं।

लेकिन मेनन ने सभी सचिवों की बैठक बुलाई और जो अंतिम क्रिया में जाना चाहते थेकी सूची मांगी। नेहरु द्वारा भेजे गए नोट‘ का उन्होंने कोई उल्लेख नहीं किया। जिन लोगों ने सरदार की अंतिम यात्रा में जाने की इच्छा व्यक्त की थी उनके हवाई यात्रा के टिकट का पूरा खर्चा मेनन ने चुकाया।


सरदार पटेल की विलक्षण उपलब्धि

Posted: Sun, 11 Nov 2012 02:42:36 +0000
indian-summer-bookहाल ही में एक अत्यंत रोचक पुस्तक: इण्डियन समरदि सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ दि एण्ड ऑफ एन एम्पायरदेखने को मिली। इसकी लेखिका एक जर्मन महिला हैं। जिनका नाम है आलेक्स फॉन टूनसेलमान। यह उनकी पहली पुस्तक है।

पुरस्कार विजेता इतिहासकार विलियम डलरिम्पल ने इस पुस्तक को एक श्रेष्ठ कृति‘ और स्वतंत्रता तथा भारत व पाकिस्तान विभाजन पर मेरे द्वारा पढ़ी गई निस्संदेह उत्तम पुस्तक” के रुप में वर्णित किया है।

जब भारत पर अंग्रेजी राज था तब देश एक राजनीतिक इकाई नहीं था। इसके दो मुख्य घटक थे: पहलाब्रिटिश भारतदूसरा,रियासतों वाला भारत। रियासतों वाले भारत में 564 रियासतें थी।

वी.पी. मेनन की पुस्तक: दि स्टोरी ऑफ इंटग्रेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स में प्रसिध्द पत्रकार एम.वी. कामथ ने लेखक के बारे में यह टिप्पणी की है:

bookजबकि सभी रियासतों-जैसाकि उन्हें पुकारा जाता था-को भारत संघ में विलय कराने का श्रेय सरदार को जाता हैलेकिन वह भी ऐसा इसलिए कर पाए कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति का उदार समर्थन मिला जो राजाओं की मानसिकता और मनोविज्ञान से भलीभांति परिचित थेऔर यह व्यक्ति कौन थायह थे वापल पनगुन्नी मेनन-वी.पी. मेनन के नाम से उन्हें जल्दी ही पहचाना जाने लगा।

वीपी के प्रारम्भिक जीवन के बारे में कम जानकारी उपलब्ध है। एक ऐसा व्यक्ति जो सभी व्यवहारिक रुप से पहले,अंतिम वायसराय लार्ड लुईस माउंटबेटन और बाद में,, भारत के लौह पुरुष महान सरदार वल्लभ भाई पटेल के खासमखास बनेने स्वयं गुमनामी में जाने से पहले अपने बारे में बहुत कम जानकारी छोड़ी। यदि वह सत्ता के माध्यम से कुछ भी पाना चाहते तो जो मांगते मिल जाता।

यह पुस्तक वी.पी. मेनन द्वारा भारतीय इतिहास के इस चरण पर लिखे गए दो विशाल खण्डों में से पहली (1955) है। दूसरी पुस्तक (1957) का शीर्षक है: दि ट्रांसफर ऑफ पॉवर इन इण्डियाA

जिस पुस्तक ने मुझे आज का ब्लॉग लिखने हेतु बाध्य कियाउसमें रियासती राज्यों के मुद्दे पर ए फुल बास्केट ऑफ ऐप्पल्सशीर्षक वाला अध्याय है। इस अध्याय की शुरुआत इस प्रकार है:

”18 जुलाई को राजा ने लंदन में इण्डिया इंटिपेंडेंस एक्ट पर हस्ताक्षर किए और माउंटबेटन दम्पति ने अपने विवाह की रजत जयंती दिल्ली में मनाईपच्चीस वर्ष बाद उसी शहर में जहां दोनों की सगाई हुई थी।

louisयह पुस्तक कहती है कि रियासती राज्यों के बारे में ब्रिटिश सरकार के इरादे अटली द्वारा जानबूझकर अस्पष्ट छोड़ दिए गए थे।” माउंटबेटन से यह अपेक्षा थी कि वह रियासतों की ब्रिटिश भारत से उनके भविष्य के रिश्ते रखने में सही दृष्टिकोण अपनाने हेतु सहायता करेंगे। नए वायसराय को भी यह बता दिया गया था कि जिन राज्यों में राजनीतिक प्रक्रिया धीमी थीके शासकों को वे अधिक लोकतांत्रिक सरकार के किसी भी रुप हेतु तैयार करें।

माउन्टबेंटन ने इसका अर्थ यह लगाया कि वह प्रत्येक राजवाड़े पर दबाव बना सकें कि वह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने हेतु अपनी जनता के बहुमत के अनुरुप निर्णय करें। उन्होंने पटेल को सहायता करना स्वीकार किया और 15 अगस्त से पहले ए फुल बास्केट ऑफ ऐपल्स‘ देने का वायदा किया।

sardar-patelजुलाई को स्टेट्स के प्रतिनिधि अपनी प्रारम्भिक स्थिति के बारे में मिले। टुनसेलमान के मुताबिक अधिकांश राज्य भारत के साथ मिलना चाहते थे। लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्यों में से चार-हैदराबादकश्मीरभोपाल और त्रावनकोर-स्वतंत्र राष्ट्र बनना चाहते थे। इनमें से प्रत्येक राज्य की अपनी अनोखी समस्याएं थीं। हैदराबाद का निजाम दुनिया में सर्वाधिक अमीर आदमी था: वह मुस्लिम थाऔर उसकी प्रजा अधिकांश हिन्दू। उसकी रियासत बड़ी थी और ऐसी अफवाहें थीं कि फ्रांस व अमेरिका दोनों ही उसको मान्यता देने को तैयार थे। कश्मीर के महाराजा हिन्दू थे और उनकी प्रजा अधिकांशतया मुस्लिम थी। उनकी रियासत हैदराबाद से भी बड़ी थी परन्तु व्यापार मार्गों और औद्योगिक संभावनाओं के अभाव के चलते काफी सीमित थी। भोपाल के नवाब एक योग्य और महत्वाकांक्षी रजवाड़े थे और जिन्ना के सलाहकारों में से एक थे: उनके दुर्भाग्य से उनकी रियासत हिन्दूबहुल थी और वह भारत के एकदम बीचोंबीच थीपाकिस्तान के साथ संभावित सीमा से 500 मील से ज्यादा दूर। हाल ही में त्रावनकोर में यूरेनियम भण्डार पाए गएजिससे स्थिति ने अत्यधिक अंतर्राष्ट्रीय दिलचस्पी बड़ा दी।

इस समूचे प्रकरण में मुस्लिम लीग की रणनीति इस पर केंद्रित थी कि अधिक से अधिक रजवाड़े भारत में मिलने से इंकार कर दें। जिन्ना यह देखने के काफी इच्छुक थे कि नेहरु और पटेल को घुन लगा हुआ भारत मिले जो उनके घुन लगे पाकिस्तान” के साथ चल सके। लेकिन सरदार पटेललार्ड माउंटबेंटन और वी.पी. मेनन ने एक ताल में काम करते हुए ऐसे सभी षडयंत्रों को विफल किया।

इस महत्वपूर्ण अध्याय की अंतिम पंक्तियां इस जोड़ी की उपलब्धि के प्रति एक महान आदरांजलि है। ऑलेक्स फॉन टुनेसलेमान लिखती हैं:

alex-vonमाउंटबेटन की तरकीबों या पटेल के तरीकों के बारे में चाहे जो कहा जाएउनकी उपलब्धि उल्लेखनीय रहेगी। और एक वर्ष के भीतर हीइन दोनों के बारे में तर्क दिया जा सकता है कि इन दोनों ने 90 वर्ष के ब्रिटिश राज,मुगलशासन के 180 वर्षों या अशोक अथवा मौर्या शासकों के 130 वर्षों की तुलना में एक विशाल भारतज्यादा संगठित भारत हासिल किया।

जो जर्मन महिला ने जो अर्थपूर्ण ढंग से लिखा है उसकी पुष्टि वी.पी. मेनन द्वारा दि स्टोरी ऑफ इंटीगिरेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स‘ के 612 पृष्ठों में तथ्यों और आंकड़ों से इस प्रकार की है।

vp-menon”564 भारतीय राज्य पांचवा हिस्सा या लगभग आधा देश बनाते हैं: कुछ बड़े स्टेट्स थेकुछ केवल जागीरें। जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक पृथक देश बना तब भारत का 364, 737 वर्ग मील और 81.5मिलियन जनसंख्या से हाथ धोना पड़ा लेकिन स्टेट्स का भारत में एकीकरण होने से भारत को लगभग 500,000 वर्ग मील और 86.5 मिलियन जनसंख्या जुड़ी जिससेभारत की पर्याप्त क्षतिपूर्ति हुई।

स्टेट्स के एकीकरण सम्बंधी अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में वी.पी. मेनन लिखते हैं: यह पुस्तक स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल को किए गए वायदे की आंशिक पूर्ति है। यह उनकी तीव्र इच्छा थी कि मैं दो पुस्तकें लिखूंजिसमें से एक में उन घटनाओं का वर्णन हो जिनके चलते सत्ता का हस्तांतरण हुआ और दूसरी भारतीय स्टेट्स के एकीकरण से सम्बन्धित हो।

टेलपीस (पश्च्यलेख)
30 अक्टूबर, 2012 को सरदार पटेल की जयंती की पूर्व संध्या पर पायनियर‘ ने एक समाचार प्रकाशित किया कि कैसे प्रधानमंत्री नेहरु हैदराबाद की मुक्ति के सरदार की योजना को असफल करना चाहते थे।

समाचार इस प्रकार है:

तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल जिनकी 137वीं जयंती 31 अक्टूबर को हैको तब के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु द्वारा एक केबिनेट मीटिंग के दौरान अपमानित और लांछित किया गया। आप एक पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझावों और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता”-नेहरु एक महत्वपूर्ण केबिनेट बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाए जिसमें निजाम की निजी सेना-रजाकारों के चंगुल सेसेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार हो रहा था।

हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर से अपने पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुऐ कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। 1947 बैच के आईएस अधिकारी एम के नायर ने अपने संस्मरण विद नो इल फीलिंग टू एनीबॉडी” में लिखा है कि उन्होंने तब से नेहरु से बोलना भी बंद कर दिया।

हालांकि नायर ने उपरोक्त वर्णित कैबिनेट बैठक की सही तिथि नहीं लिखी हैपरन्तु यह हैदराबाद मुक्ति के लिए चलाए गए भारतीय सेना के अभियान ऑपरेशन पोलोजो 13 सितम्बर, 1948 को शुरु होकर 18 सितम्बर को समाप्त हुआके पूर्ववर्ती सप्ताहों में हुई होगी।

जबकि सरदार पटेल 2,00,000 रजाकारों के बलात्कार और उत्पात से हैदराबाद को मुक्त कराने के लिए सेना की सीधी कार्रवाई चाहते थेउधर नेहरु संयुक्त राष्ट्र के विकल्प को प्राथमिकता दे रहे थे।

नायर लिखते हैं कि सरदार पटेल के प्रति नेहरु की निजी घृणा 15 सितम्बर, 1950 को उस दिन और खुलकर सामने आई जिस दिन सरदार ने बॉम्बे (अब मुंबई) में अंतिम सांस ली। सरदार पटेल की मृत्यु का समाचार पाने के तुरंत बाद नेहरु ने राज्यों के मंत्रालय को दो नोट भेजेइनमें से एक में नेहरु ने मेनन को लिखा कि सरदार पटेल द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली के कडिल्लक(Cadillacकार को उनके कार्यालय को वापस भेज दिया जाए। दूसरा नोट क्षुब्ध कर देने वाला था। नेहरु चाहते थे कि सरकार के जो सचिव सरदार पटेल की अंतिम क्रिया में भाग लेने के इच्छुक थेवे अपने निजी खर्चे पर ही जाएं।

लेकिन मेनन ने सभी सचिवों की बैठक बुलाई और जो अंतिम क्रिया में जाना चाहते थेकी सूची मांगी। नेहरु द्वारा भेजे गए नोट‘ का उन्होंने कोई उल्लेख नहीं किया। जिन लोगों ने सरदार की अंतिम यात्रा में जाने की इच्छा व्यक्त की थी उनके हवाई यात्रा के टिकट का पूरा खर्चा मेनन ने चुकाया।

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जब भीमसेन ने दुर्योधन की जंघाओं पर वार किया और दुर्योधन की दशा खराब हो गई तो उसकी दशा देख उनकी आंखे क्रोध से लाल हो गई। वे कृष्ण से कहने लगे- कृष्ण दुर्योधन मेरे समान बलवान है इसकी समानता करने वाला कोई नहीं हे। आज अन्याय करके दुर्योधन को गिराया गया है।तब श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि जब दुर्योधन ने द्रोपदी के साथ र्दुव्यहार किया था तब भीम ने प्रतिज्ञा की थी कि वे अपनी गदाओं से दुर्योधन की जंघाओं को तोड़ देंगे अब आगे....
दुर्योधन को भीमसेन के द्वारा मारा गया देख पांडव व पांचालों को बड़ी प्रशंसा हुई। वे सिंहनाद करने लगे। किसी ने धनुष टंकारा तो कोई शंख बजाने लगा। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने कहा मरे हुए शत्रु को अपनी कठोर बातों से फिर मारना उचित नहीं है। कृष्ण बोले यह मर तो उसी दिन गया था जब इसने लज्जा को त्यागकर पापियों के समान काम करना शुरू कर दिया था। श्रीकृष्ण की बात सुनकर सब नरेश अपने-अपने शंख बजाते हुए शिविर को चले गए। सब लोग पहले दुर्योधन की छावनी में गए वहां कुछ बूढ़े मंत्री और किन्नर बैठे थे बाकि रानियों के साथ राजधानी चले गए थे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- तुम स्वयं उतरकर अपने अक्षय तरकस व धनुष को भी रथ से उतार लो। इसके बाद में उतारूंगा यही करने में तुम्हारी भलाई है। अर्जुन ने वैसा ही किया। फिर भगवान ने घोड़ों की बागडोर छोड़ दी और स्वयं भी रथ से उतर पड़े। जैसे ही कृष्ण रथ से उतरे ही उस रथ पर बैठा हुआ दिव्य कपि अंर्तध्यान हो गया।
उसके सारे उपकरण व धुरी लगाम, घोड़े जलकर नष्ट हो गए। यह देख सभी पांडवों को बहुत आश्चर्य हुआ। यह देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा हे प्रभु यह क्या आश्चर्य जनक घटना हो गई। एकाएक रथ क्यों जल गया? यदि मेरे सुनने योग्य हो तो इसका कारण बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन लड़ाई  में बहुत तरह के अस्त्रों के आघात से यह रथ तो पहले ही जल चुका था। सिर्फ बैठे रहने के कारण भस्म नहीं हुआ था। जब तुम्हारा सारा काम पूरा हो गया तब मैंने इस रथ को छोड़ा।

Friday, July 29, 2011

swmi


पाप-पुण्य के बारे में कई बातें कही जाती है। कुछ लोग जिसे पाप मानते हैं, दूसरे उसे ही उचित या सही ठहरा देते हैं। जो बात किसी के लिये उसका कर्तव्य और धर्म है वह किसी के लिये घोर पाप या नीच कृत्य हो सकता है।

सरल और थोड़े से शब्दों में यदि पाप की परिभाषा देना हो तो कहा जा सकता है कि- अपने स्वार्थ यानी मतलब के लिये किसी को धोखा देना, उसका हक हड़पना, गुमराह करना और उसके आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाना ही दुनिया का सबसे बड़ा पाप कर्म है।

आइये चलते हैं कि  एक बेहद सुन्दर कथा की ओर जो पाप के एक नए ही रूप से आपका परिचय कराती है....

स्वामी विवेकानंद अपने अमेरिका प्रवास से विदाई ले रहे थे। उनके भाषणों ने पूरे अमेरिका में धूम मचा रखी थी। सभागार सुनने वालों से खचाखच भरे होते थे। उनके व्याख्यानों में बम छूटते थे। लोगों के अंधविश्वासों और अवैज्ञानिक धारणाओं को स्वामी जी अपने अचूक तर्कों और वैज्ञानिक विश्लेषणों से तहस-नहस कर देते थे। आज इस बात की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि ईसाइयों के देश में यह अकेला हिन्दू संन्यासी कितने साहस और पौरुष के साथ भारतीय अध्यात्म की पताका फहरा रहा था।

ईसाई श्रोताओं के बीच हमारा यह योद्धा संन्यासी जोर से उद्घोष करता है-'' पश्चाताप मत करो( कन्फेशन), पश्चाताप मत करो.....यदि आवश्यक हो तो उसे थूक हो, परंतु आगे बढ़ो! बढ़ते चलो !! पश्चाताप के द्वारा अपने को बंधनों में मत डालो। अपने पवित्र, चिरमुक्त तथा परमात्मा के साकार रूप आत्मा को जानकर पाप के बोझ जैसा कुछ जो भी, उसे फेंक डालो। किसी को भी पापी कहने वाला खुद ईश्वर की निंदा करता है। तुम सभी सम्मोहित हो, इससे बाहर निकलो। याद रखो कि तुम सभी ईश्वर की दिव्य संतानें हो, अपनी महानता और दिव्यता को सदैव याद रखो। और उस दिव्यता के अनुरूप ही तुम्हारा जीवन होना चाहिये।''

स्वामी विवेकानंद के इन महान तेजस्वी विचारों का ही कमाल था कि उनके आध्यात्मिक विचार तेज गति से सारे संसार में फेल गए।